The Castle | Have We Reached There, Yet!

The Castle | Have We Reached There, Yet!

They say he looks completely different when he comes into the village and different when he leaves it, different before he has had a beer, different afterward, different awake, different asleep, different alone, different in a conversation, and, quite understandably after all this, almost utterly different up there at the Castle.

चलता – फिरता प्रेत | मानव कौल | निजी मैं की यात्रा

चलता – फिरता प्रेत | मानव कौल | निजी मैं की यात्रा

झूठ सुनहरा था, भूस की तरह, सत्य उसमे काले सांप की तरह घुस गया। हम डर गए। बहुत। इतना डर गए कि लाठी लेकर भूस के ढेर में सांप मारने लगे। सारा घर भूस के तिनकों से भर गया। दीवार, छत, खिड़की, दरवाजे और हम – सब छोटे छोटे भूस के तिनकों के बीच छिप गए। सांप हाथ नहीं आया… रात में थककर सोने पर पैरों पर कुछ रेंगता महसूस हुआ और हम अकड़ गए, हमने डर कर हाथ जोड़ लिए, तभी कानों में फिस्फिसाती सी आवाज़ आई – ‘डरो मत, मैं तुम्हें नहीं काटूंगा। तुम पर अब भी झूठ के तिनके बिखरे हुए हैं। अभी तुम सत्य के काटे से जीने लायक नहीं हुए।’

Samuel Beckett’s The Complete Dramatic Works | Truth Beyond Words

Samuel Beckett’s The Complete Dramatic Works | Truth Beyond Words

बहुत सी रातों में अपने मरने का सपना देखा है। पर मरने के ठीक एक पहले हम आँख खोलकर खुद को मृत्यु से बचा लेते हैं। ये इंसान होने की चालाकी है। पर वो एक क्षण जिसमें हम मृत्यु से जीवन के बीच की दूरी पार करते हैं – वो क्षण भरा मिला है निरीह चुप्पी से। हर बार। जहाँ शब्द हमेशा जो कहा जा रहा है उसके आड़े आए हैं। उस एक क्षण में निश्चित मृत्यु का इंतज़ार है पर मृत्यु नहीं। और फिर तुरंत हमें धड़कन महसूस होती है और हम खुश होकर उस एक क्षण को बीती यादों के बक्से में बंद कर देते हैं।

आधे- अधूरे | मोहन राकेश | नाटक | आधे-  अधूरे… हम सब की तरह |

आधे- अधूरे | मोहन राकेश | नाटक | आधे- अधूरे… हम सब की तरह |

एक घर, उसमें रहने वाले कुछ लोग और उनकी ज़िंदगी के इर्द गिर्द घूमते संवाद। संक्षेप में तो यह नाटक यही है। परंतु क्या सच में यह नाटक भी इस पंक्ति के जितना ही सतही है? या कुछ और भी है इस नाटक में जो थोड़ा गहरा है, जिसे इन कुछ शब्दों से नहीं समझाया जा सकता है।