Top Quotes from Agyeya's Apne Apne Ajnabee | EkChaupal

अपने अपने अजनबी अज्ञेय का उपन्यास है। ये कुछ पसंदीदा पंक्तियाँ हैं उस किताब से। आपको किताब पसंद आएगी। पढ़िएगा।

कुछ भी पूरा नहीं होता। ना जीवन। ना मृत्यु।

अज्ञेय का उपन्यास अपने अपने अजनबी अपने आप में बड़ा अनूठा है। शुरू में बड़ी मुश्किल हुई इसके संसार और लोगों के जीवन में उतरने में। उखड़ी उखड़ी बातें जो किसी एक सिरे में बंधी तो लगती हैं पर वो सिरा टटोला तो लगा जैसे बीच के मोती गायब हैं। फिर लगा ये उखड़ती हुई सासें हैं। अपने को पहचानने की कोशिश करती हुई। सलमा और येको की कहानी।


कब्र तो समय से ही बन गयी है। उन्हें ही मरने में देर हो रही है।

निरे अजनबी डर के साथ कैद होकर कैसे रह सकता है?

शायद यही वास्तव में मृत्यु होती है, जिसमें कुछ भी होता नहीं, सब कुछ होते-होते रह जाता है। होते-होते रह जाना ही मृत्यु का विशेष रूप है जो मनुष्य के लिए चुना गया है जिसमें कि विवेक है, अच्छे- बुरे का बोध है। यह उसमें न होता तो उसका मरना सम्पूर्ण हो सकता।

क्या अपने सारे विकास के बावजूद हम मनुष्य भी निरे पौधे नहीं जो बेबस सूरज की ओर उगते हैं?

और हम जड़ें कहीं नहीं फेकते, या कि सतह पर ही इधर-उधर फैलाते जाते हैं, लेकिन जीते हैं सूरज के सहारे, ही।

जरा सोचो सखी, एक जवान लड़की और एक बूढ़ी औरत एक बर्फ के तूफान में एक घर में कैद हो जाते हैं। महीनों के लिए। धूप भी नहीं। राशन है। शुरू से जो जवान है उसे मृत्यु का डर है, बूढ़ी को नहीं। उसने स्वीकार लिए है उस अनजान चीज को। बस सारा ड्रामा यहां। अकेलापन, त्रासदी, और जीने की जटिलता। क्या बीतता है जो मजबूर कर देता है कि हम एक दिन अपने साथ वालों की मृत्यु की कल्पना करना शुरू कर देते हैं? इतना कि हमारे हाथ उनकी गर्दन पर पहुंच जाते हैं। और अचानक से दिखती हैं उनकी आंखें जो ना दुत्कारती हैं और न गुस्सा, बस पूछती हैं – रुक क्यों गए?

जो हमारे भीतर नहीं है वह हम बाहर कैसे दे सकते हैं – कैसे देना चाह सकते हैं? खुली, निखरी हुई, स्निग्ध, हँसती धूप – मैं बाहर उसकी कल्पना करती हूँ तो वह मेरे भीतर भी खिल आती है और मैं सोच सकती हूँ कि मैं उसे औरों को दे सकती हूँ। नहीं तो – कितना ठंडा अंधेरा होता है उसके भीतर, जिसे मारना है और सिवा मरने के कुछ भी नहीं करना है।

कैसे, जो जीवित नहीं है वे उन पर इतना बड़ा शासन करते हैं जो जीवन से छटपटा रहे हैं।

और स्वतन्त्रता- कौन स्वतंत्र है? कौन चुन सकता है कि वह कैसे रहेगा, या नहीं रहेगा?

कितना कमीना है यह संतोष, जो दूसरों को हारते और टूटते देखकर होता है – क्या यह एक अत्यंत विकृत ढंग की जिजीविषा नहीं है?

कैसे चुनते हैं अपनी मृत्यु? पूरा उपन्यास बस एक सवाल पूछता है कि क्या हमें कुछ भी चुनने की आजादी है – नाम, जगह, मृत्यु? ये कैसा जीवन है कि कोई भी चीज अपनी इच्छा se नहीं चुन सकते? और अंत में मृत्यु भी नहीं? और अगर चुनो तो? तब भी क्या ये संभव है? और अजनबी… क्या हम कभी अपने अजनबी चुन पाते हैं जिनसे कह सकें वो सब कुछ जो हमने अपने निजी से नहीं कहा, माँग सकें माफी जो अपने ईश्वर से नहीं मांगी क्योंकि ईश्वर तो कभी अजनबी रहा ही नहीं…

कि सजीव उपस्थिती का नाम ही ईश्वर है – कोई भी उपस्थिती ईश्वर है। क्यूंकी नहीं तो उपस्थिती हो ही कैसे सकती है?

और मौत और ईश्वर को हम अलग-अलग पहचान भी तो कभी-कभी ही सकते हैं। बल्कि शायद मन से ईश्वर को तब तक पहचान नहीं सकते जब तक कि मृत्यु में ही उसे न पहचान लें।

लेकिन भ्रम भी क्या कम ईश्वर है? और ईश्वर की कौनसी पहचान हमारे पास है जो भ्रम नहीं है? जब ईश्वर पहचान से परे है तो कोई भी पहचान भ्रम है। ईश्वर को हम कैसे जान सकते हैं? जो हम जान सकते हैं वे कुछ गुण हैं – और गुण हैं इसलिए ईश्वर के तो नहीं हैं। हम पहचानते हैं अनिवार्यता, हम पहचानते हैं अंतिम और हकरम और सम्पूर्ण और अमोघ नकार – जिस नकार के आगे और कोई सवाल नहीं है और न कोई आगे जवाब ही… इसलिए मौत ही तो ईश्वर का एकमात्र पहचाना जा सकन्वला रूप है। पूरे नकार का गायन ही सच्चा ईश्वर गायन है, बाकी सब सतही बातें हैं और झूठ हैं।

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